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भारत निर्वाचन आयोग | अनुच्छेदों का विवरण (324-329)

 

अनुच्छेद 324 (1)
1. निर्वाचन आयोग की स्थापना |
2. संसद (लोकसभा, राज्य सभा), राज्य विधान मण्डल (विधान सभा व विधान परिषद), राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति के         निर्वाचन हेतु निर्वाचन आयोग का निर्माण |
अनुच्छेद 324 (2)
1. निर्वाचन आयोग की संरचना |
2. निर्वाचन आयोग मुख्या चुनाव आयुक्त तथा उतने चुनाव आयुक्तों से मिलकर बनेगा जो राष्ट्रपति निर्धरित करे |

अनुच्छेद 324 (3)

- इसी अनुच्छेद में लिखा है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ही, आयोग का अध्यक्ष होगा |

अनुच्छेद 324 (4)

- राष्ट्रपति द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सहायता हेतु प्रादेशिक आयुक्तों की नियुक्ति की जा सकेगी |

अनुच्छेद 324 (5)

1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त व अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सेवा शर्तें व पदावधि का निर्धारण राष्ट्रपति करेगा |

2. त्यागपत्र- सभी आयुक्त अपना त्याग पत्र केवल राष्ट्रपति को देंगे |

3. हटाने की प्रक्रिया-  मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्चा न्यायलय के न्यायधीश का दर्जा प्राप्त है इसीलिए इन्हे         हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्चा न्यायलय के न्यायधीश के सामान ही होगी |

    अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है |

नोट: सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश को संविधान की धारा 124 (4)/(5) के द्वारा हटाया जा सकता है

अनुच्छेद 324 (6)

- राष्ट्रपति एवं राज्यपाल निर्वाचन आयोग को कर्मचारी उपलब्ध कराएँगे

नोट 1. :
- 25
जनवरी 1950 मूलतः एक ही आयुक्त था  |
- 16
अक्टूबर 1989 को आयोग तीन सदस्यीय हो गया  जिसमे  एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा कर दी गयी |
- 1990
में निर्वाचन आयोग पुनः एक सदस्यीय हो गया |
- 1
अक्टूबर 1993 को आयोग फिर एक बार तीन सदस्यीय हो गया जो आज तक तीन सदस्यीय ही है |
नोट 2. : 
-
निर्वाचन आयोग की योग्यता का वर्णन न तो संबिधान में मिलता है और न ही किसी अधिनियम में
    
संविधान में वर्णित नहीं है (योग्यता, सेवा, सैलरी, पदावधि) |

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अब बात करते है 1991 के निर्वाचन आयोग के सन्दर्भ में बने अधिनियम की, जिसे निर्वाचन आयुक्त अधिनियम- 1991 कहा जाता है

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निर्वाचन आयुक्त अधिनियम- 1991 

1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त व अन्य निर्वाचन आयुक्त के वेतन भत्ते व अन्य लाभ सामान होंगे |

    (चूँकि निर्वाचन आयोग के आयुक्तों को सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश का दर्जा प्राप्त है अतः इनका वेतन भी         उन्हीं के समान होगा) |

2. वेतन: 2.5 लाख प्रति महीना |


3. कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं (अर्थात शपथ लेने के बाद इनकी वेतन व सेवा शर्तों में किसी भी प्रकार का             अलाभकारी परिवर्तन नहीं होगा, जो भी परिवर्तन होगा वो अगले आयुक्तों से लागू होगा ) |

4. पदावधि: 6 वर्ष (या अधिकतम आयु- 65 वर्ष ) |


मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया (अनुच्छेद 124(5) के अनुसार)

१.  हटाने या जांच के उद्देश्य से एक कानून बनाया जा सकता है

2.  न्यायाधीश पूछताछ अधिनियम -1968

3.  अतः हटाने की प्रक्रिया  124(4)/(5) एवं न्यायधीश जाँच अधिनियम-1968 के साथ होगी

भारतीय संविधान में महाभियोग


विकिपीडिया से लिए गए तथ्य
उस समिति में एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस और एक ऐसे प्रख्यात व्यक्ति को शामिल किया जाता है जिन्हें स्पीकर या अध्यक्ष उस मामले के लिए सही मानें.
महाभियोग की कार्यवाही
अगर यह प्रस्ताव दोनों सदनों में लाया गया है तो दोनों सदनों के अध्यक्ष मिलकर एक संयुक्त जांच समिति बनाते हैं.
दोनों सदनों में प्रस्ताव देने की सूरत में बाद की तारीख़ में दिया गया प्रस्ताव रद्द माना जाता है.
जांच पूरी हो जाने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट स्पीकर या अध्यक्ष को सौंप देती है जो उसे अपने सदन में पेश करते हैं.
अगर जांच में पदाधिकारी दोषी साबित हों तो सदन में वोटिंग कराई जाती है.
प्रस्ताव पारित होने के लिए उसे सदन के कुल सांसदों का बहुमत या वोट देने वाले सांसदों में से कम से कम दो तिहाई का समर्थन मिलना ज़रूरी है. अगर दोनों सदन में ये प्रस्ताव पारित हो जाए तो इसे मंज़ूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजा जाता है.
किसी जज को हटाने का अधिकार सिर्फ़ राष्ट्रपति के पास है.
भारत में सिर्फ राष्ट्रपति को ही महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है राष्ट्रपति के अलावा किसी को नहीं हटाया जा सकता
या तो प्रस्ताव को बहुमत नहीं मिला, या फिर जजों ने उससे पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया.
हालांकि इस पर विवाद है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी को महाभियोग का सामना करने वाला पहला जज माना जाता है. उनके ख़िलाफ़ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था.
यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया क्योंकि उस वक़्त सत्ता में मौजूद कांग्रेस ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया और प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला.
कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन देश के दूसरे ऐसे जज थे, जिन्हें 2011 में अनुचित व्यवहार के लिए महाभियोग का सामना करना पड़ा.
यह भारत का अकेला ऐसा महाभियोग का मामला है जो राज्य सभा में पास होकर लोकसभा तक पहुंचा. हालांकि लोकसभा में इस पर वोटिंग होने से पहले ही जस्टिस सेन ने इस्तीफ़ा दे दिया.
महाभियोग के पिछले मामले
2015 में गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस जे बी पार्दीवाला के ख़िलाफ़ जाति से जुड़ी अनुचित टिप्पणी करने के आरोप में महाभियोग लाने की तैयारी हुई थी लेकिन उन्होंने उससे पहले ही अपनी टिप्पणी वापिस ले ली.
2015 में ही मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस एसके गंगेल के ख़िलाफ़ भी महाभियोग लाने की तैयारी हुई थी लेकिन जांच के दौरान उन पर लगे आरोप साबित नहीं हो सके.
आंध्र प्रदेश/तेलंगाना हाई कोर्ट के जस्टिस सीवी नागार्जुन रेड्डी के ख़िलाफ़ 2016 और 17 में दो बार महाभियोग लाने की कोशिश की गई लेकिन इन प्रस्तावों को कभी ज़रूरी समर्थन नहीं मिला.
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ 2018 में राज्य सभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया जिसे उपराष्ट्रपति वैंकैया नायडू ने ख़ारिज कर दिया ।

 भारतीय संविधान में इस प्रक्रिया को संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है। महाभियोग वो प्रक्रिया है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए किया जाता है। इसका ज़िक्र संविधान के अनुच्छेद 61, 124 (4), (5), 217 और 218 में मिलता है.

महाभियोग प्रस्ताव सिर्फ़ तब लाया जा सकता है जब संविधान का उल्लंघन, दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित हो गए हों. नियमों के मुताबिक़, महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है. लेकिन लोकसभा में इसे पेश करने के लिए कम से कम 100 सांसदों के दस्तख़त, और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के दस्तख़त ज़रूरी होते हैं. इसके बाद अगर उस सदन के स्पीकर या अध्यक्ष उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लें (वे इसे ख़ारिज भी कर सकते हैं) तो तीन सदस्यों की एक समिति बनाकर आरोपों की जांच करवाई जाती है.

उसी साल सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस पीडी दिनाकरन के ख़िलाफ़ भी महाभियोग लाने की तैयारी हुई थी लेकिन सुनवाई के कुछ दिन पहले ही दिनाकरन ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.




आशा है की आपको हमारी ये पोस्ट पसंद आयी होगी, मिलते है एक नयी पोस्ट के साथ तब तक के लिए वन्दे मातरम

नीलम

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